Welcome to My Accessible Website

बीरबल साहनी की छवि

बीरबल अपने माता-पिता स्वर्गीय प्रो. रुचि राम साहनी और श्रीमती ईश्वर देवी की तीसरी संतान थे। उनका जन्म 14 नवंबर 1891 को शाहपुर जिले के एक छोटे से कस्बे भेरा में हुआ था, जो अब पश्चिमी पंजाब का हिस्सा है और कभी व्यापार का एक समृद्ध केंद्र था, जिस पर मूर्तिभंजक महमूद गजनवी ने आक्रमण किया था। भेरा के इर्द-गिर्द घूमने वाली तत्काल दिलचस्पी इस तथ्य से बढ़ जाती है कि यह छोटा सा शहर साल्ट रेंज से बहुत दूर नहीं है जिसे वास्तविक "भूविज्ञान संग्रहालय" के रूप में वर्णित किया जा सकता है। इन बंजर पर्वतमालाओं की यात्राएँ, जहाँ भारतीय भूविज्ञान के कुछ सबसे दिलचस्प प्रसंग और स्थलचिह्न छिपे हुए हैं, अक्सर हमारे बचपन के दौरान भेरा की यात्राओं के साथ समन्वित होती थीं, विशेष रूप से खेवड़ा की। यहाँ भूवैज्ञानिक युग से संबंधित कुछ पौधे-असर वाली संरचनाएँ हैं, जिनके बारे में बीरबल ने बाद के वर्षों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भेरा उनका पैतृक घर था, लेकिन उनके माता-पिता एक समय में बहुत दूर, वास्तव में सिंधु पर देहरा इस्माइल खान के एक स्वप्निल बंदरगाह पर बसे थे, और बाद में लाहौर चले गए। प्रो. साहनी के पिता को भाग्य के उलटफेर और हमारे दादा की मृत्यु के कारण देहरा इस्माइल खान छोड़ना पड़ा, जो शहर के एक प्रमुख नागरिक थे। भाग्य के परिवर्तन के साथ, जीवन अलग और कठिन हो गया। निडर होकर, रुचि राम साहनी ने स्कूल में दाखिला लेने के लिए देहरा इस्माइल खान से झंग तक, 150 मील से अधिक की दूरी पर, अपनी पीठ पर पुस्तकों का एक बंडल लेकर पैदल यात्रा की। बाद में भेरा और लाहौर में, उन्होंने खुद को एक विद्वान के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने खुद को पूरी तरह से छात्रवृत्तियों पर शिक्षित किया जो उन्होंने जीती थीं। इस प्रकार उनका पालन-पोषण जीवन के कठिन स्कूल में हुआ, और वे पूरी तरह से एक स्व-निर्मित व्यक्ति थे।

प्रो. रुचि राम साहनी उदार विचारों वाले व्यक्ति थे, और अपने करियर के दौरान वे पंजाब में ब्रह्मो समाज आंदोलन के नेताओं में से एक बन गए, जो एक प्रगतिशील धार्मिक और सामाजिक उभार था, जिसने उस समय नई-नई जड़ें जमा ली थीं। निस्संदेह पिता ने अपने शुरुआती दिनों में कलकत्ता प्रवास के दौरान इन विचारों को आत्मसात किया था। उन्होंने जाति से पूरी तरह अलग होकर अपने विचारों को व्यावहारिक रूप दिया। और जब बुलावा आया, तो उस समय वृद्ध हो चुके पिता स्वर्ण मंदिर के तालाब की पवित्र मिट्टी में घुटनों तक डूबे रहे और जमा हुई मिट्टी को साफ करने में मदद करने के लिए अपने कमजोर कंधों पर टोकरी भर मिट्टी उतारी। उनका धर्म कोई सीमा नहीं जानता था। हमेशा एक देशभक्त, उन्होंने स्वतंत्रता के संघर्ष में खुद को दिल और आत्मा से झोंक दिया और यहां तक ​​कि गुरु का बाग में नौकरशाही की कठोरता का भी स्वाद चखा। उन्होंने अपने देशवासियों के अधिकारों के लिए बहादुरी से लड़ाई लड़ी, और एक से अधिक बार गिरफ्तारी के कगार पर थे।

लगभग 1922 में, जब उन्होंने तत्कालीन सरकार द्वारा उन्हें प्रदान की गई उपाधि का प्रतीक चिन्ह लौटा दिया, तो प्रो. रुचि राम साहनी को उनकी पेंशन बंद करने की धमकी दी गई, लेकिन उनका एकमात्र उत्तर यह था कि उन्होंने अपने कार्य के सभी संभावित परिणामों के बारे में सोच लिया था और उन्हें पहले से ही भांप लिया था। उन्होंने अपनी पेंशन बरकरार रखी! यह अवश्यंभावी था कि इन घटनाओं ने परिवार पर अपनी छाप छोड़ी और बीरबल ने भी इसे आत्मसात कर लिया। यदि बीरबल कांग्रेस आंदोलन के कट्टर समर्थक बन गए, तो यह उनके पिता के जीवित उदाहरण के कारण ही संभव हुआ। इसमें यह भी जोड़ा जा सकता है कि उन्हें प्रेरणा, चाहे दुर्लभ अवसरों पर ही क्यों न हो, मोतीलाल नेहरू, गोखले, श्रीनिवास शास्त्री, सरोजिनी नायडू, मदन मोहन मालवीय और अन्य राजनीतिक हस्तियों की उपस्थिति से मिली, जो रुचि राम के लाहौर स्थित घर में मेहमान हुआ करते थे, जो ब्रैडलाफ हॉल के पास स्थित था, जो उस समय पंजाब में राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र था।

="https://www.bsip.res.in/images/pages/prof_birbal_sahni.jpg" alt="बीरबल साहनी" title="Prof. Birbal Sahni Image" class="img-fluid img-history rounded shadow-sm">

बीरबल ने पूरी पढ़ाई (पूर्ण शिक्षा), लाहौर, भारत में पहले मिशन और सेंट्रल मिडिल स्कूलों में तथा तदोपरांत जहाॅं उनके पिता रसायनविज्ञान में एक पद पर थे वहाॅं गवर्नमेंट कालेज में की। पंजाब विश्वविद्यालय की दसवीं की परीक्षा में संस्कृत में पहला स्थान और बारहवीं के विज्ञान में सूबे में दर्जा पाते हुए उन्होंने बहुत-सी शैक्षणिक योग्यताएं प्राप्त कीं। संस्कृत के प्रति उनका झुकाव अंत तक रहा और बाद के सालों में तो वह वास्तव में इसके प्रति ज़्यादा निष्ठावान हो गए। 1911 में वह लाहौर से स्नातक हुए और उसी साल इम्मानुएल कालेज, कैंब्रिज में प्रवेश ले लिया। बीरबल 1911 में कैंब्रिज से स्नातक हुए और जल्दी ही शोध के लिए जम एग।

उन्होंने उस ज़माने के बहुत नामी-गिरामी वनस्पतिविज्ञानी, प्रेरणादायक, नेतृत्व एवं दिशा-निर्देश के अधीन अत्यंत रूचि से शोध की शुरूआत की।

प्रो. ए.सी. सीवर्ड जीवित एवं जीवाश्म पादपों पर उसके लेखों को सुनने के प्रेरणा स्त्रोत थे किंतु एक स्त्रोत ने गौरव जोड़ दिया जब उनके प्रिय विद्यार्थी बीरबल का नाम गोंडवाना और अन्य पेड़-पौधों के अध्ययन में उल्लिखित था। प्रो. एवं श्रीमती सीवर्ड बीरबल के प्रति मृदु ख़याल रखते थे तथा सदैव स्नेही सीमाओं में लिखते थे। यह शिक्षक एवं उसके शिष्य के बीच के बजाय और गहरा व अति सुंदर नाता था तथा जिसे बीरबल ने बहुत सी अन्य चीजों के बजाए संजोया। कैंब्रिज में, केवल अभी छात्र के लिए भारतीय जीवित पादपों के बीरबल की रूचि और ज्ञान को वक़्त से पहले ही मान्यता मिल गई थी, लाॅसन की वनस्पतिविज्ञान की पाठ्य-पुस्तक जो कि आजकल इस विषय पर बृहत रूप से प्रयुक्त की जाती है को परिशोधित करने की साग्रह प्रार्थना की गई थी।

जीवाश्म पादपों पर उनके शोधों के लिए 1919 में उन्हें लंदन विश्वविद्यालय की डी.एस-सी. उपाधि से नवाज़ा गया। उसी वर्ष में घर लौटते समय भारत में पुरावनस्पतिविज्ञान का स्थान और ऊॅंचा करते हुए उन्होंने केवल अपने अन्वेषणों को ही जारी नहीं रखा बल्कि राष्ट्र के हर भाग से समर्पित छात्रों के समूह को भी अपने चहुंओर एकत्रित किया। भारत में समय से पहले ही उनकी जीवन-यात्रा के दौरान, बीरबल का प्रो. सीवर्ड ने अति अभिनंदन किया जब उन्होंने भारत से प्राप्त कुछेक जीवाश्म संग्रहणों का अध्ययन करने से यह कहते हुए इन्कार कर दिया कि इस पर सबसे पहला अधिकार मेरे युवा शिष्य का है। अंततोगत्वा सामग्री बीरबल पर आ गई। अपने भविष्य के शोध के लिए इसने मार्ग प्रशस्त किया तथा इस प्रकार भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के साथ दीर्घ एवं चिरस्थायी संगति की शुरूआत हुई।

ऐसे बहुत-से अवसर रहे हैं जब बीरबल ने अपने गुरू जी जिनको उन्होंने सीमा से परे सम्मान एवं प्यार दिया, की भूमिका पर अच्छे कृत्य को कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार किया है। भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण ने उनके सम्मान में उनकी अर्ध प्रतिमा स्थापित करके उन्हें स्मरण किया है। कई पुरावानस्पतिक शोधों के अलावा उन्होंने पंजाब लवण पर्वतमाला की लवण श्रृंखलाओं की आयु तथा दक्कन पाश की आयु से संबद्ध महत्वपूर्ण लेखों को प्रस्तुत किया तथा जिन्हें उन्होंने प्रकाशित किया।

नए खोले गए लखनऊ विश्वविद्यालय का वनस्पतिविज्ञान विभाग के प्रथम आचार्य के रूप में उन्होंने 1921 में कार्यभार संभाला। उन्होंने अपने आपको जल्दी ही दिल और आत्मा से संगठन के कार्य में लगा दिया। अन्य अति व्यस्तताओं के बावजूद, अपने हाथों से जीवाश्म पादपों की पिसाई और तनु खंडों को बनाते हुए उन्हें अक्सर देखा जाता था। कठिन परिश्रम एवं प्रेरक आकर्षण से उन्होंने विश्वविद्यालय की साख बना दी जो जल्दी ही भारत में वानस्पतिक व पुरावानस्पतिक अन्वेषणों का पहला केंद्र बन गया।

भारतीय विज्ञानी को संयोगवश प्रथम प्रदान करने वाली एस-सी.डी. उपाधि प्रदान कर कैंब्रिज विश्वविद्यालय ने उनके शोधों को मान्यता दी। जब उन्हें लंदन की राॅयल सोसाइटी का अध्येता चयनित किया गया तब उन्हें 1936 में ब्रिटिश का सर्वोच्च वैज्ञानिक सम्मान मिला। उन्हें क्रमशः 1930 एवं 1935, पांचवीं एवं छठी अंतराष्ट्रीय वानस्पतिक कांग्रेस के वानस्पतिक खंड का उपाध्यक्ष, वर्ष 1940 के लिए भारतीय विज्ञान कांग्रेस का महा अध्यक्ष; 1937-39 और 1943-44 में राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, भारत का अध्यक्ष चुना गया। 1948 में उन्हें कला एवं विज्ञान की अमेरिकी अकादमी का विदेश सम्मानित सदस्य चुना गया। अंतर्राष्ट्रीय वानस्पतिक कांग्रेस, स्टाॅकहाॅम के सम्मानित अध्यक्ष के रूप में उनका चयन शीर्ष सम्मान के रूप में मिला।

बीरबल साहनी

अपनी शैक्षणिक रूचि के बावजूद, बीरबल किसी सूरत में भी एकांतवासी नहीं थे तथा उन्होंने हालांकि अपने तरीके से जीवन के पड़ाव का पूरी सीमा में आनंद लिया। कैंब्रिज में जब भारतीय विद्यार्थियों ने रोचक परिधान का मंचन किया, वह साधु (मुनि) के रूप में आए, जो उनकी अंतरात्मा को कुल मिलाकर अप्रतीकात्मक नहीं था। वह खेल के अति शौकीन थे तथा खेल-कूद में बहुत समय तक रूचि बरकरार रखी। उन्होंने अपने स्कूल एवं कालेज हाकी एकादश का ही प्रतिनिधित्व नहीं किया अपितु वह सरकारी स्कूल, लाहौर में भी टेनिस में अति पुष्ट थे। कैंब्रिज में उन्होंने आॅक्सफोर्ड मजलिस के खि़लाफ़ टेनिस में विजेता कैंब्रिज भारतीय मजलिस का प्रतिनिधित्व किया।

हिमालय में टेढ़े-मेंढ़े रास्ते

बीरबल ने अपनी रोज़मर्राह की पढ़ाई और इम्तहान के कार्य का महत्वपूर्ण त्याग कर भी छात्र काल में भी हिमालयी पादपों का सबसे बड़ा संग्रहण किया। उन्होने हिमालय की विपुल अध्ययन यात्राएं कीं जिसके दरम्यान हुकर की फ्लोरा आॅफ ब्रिटिश इंडिया (ब्रिटिश भारत के पेड़-पौधे) उनकी अपरिवर्ती संगी रही। इन पादपों के अन्वेषण में, दूसरे कामों का ख़्याल रखे बिना वह बहुत ज़्यादा वक्त तक निष्ठावान रहे, मैं विश्वास करता हॅंूं कि उनमें से कुछेक अब नूतन पादपालय की पूंजी हैं। बाह्य जीवन एवं पर्वतारोहण वक़्त से पहले किए गए जोश थे। बुरान दर्रा (16,800 फुट ऊंचा) सन्निहित करते हुए पठानकोट से रोहतांग दर्रा; कसौली होते हुए कालका से चिनी (हिंदुस्तान-तिब्बत मार्ग), सुबाथु, शिमला, नरकंडा, रामपुर, बुशर किल्बा के टेढ़े-मेंढ़े रास्तों की छलांगें उल्लेखनीय हैं। शिमला से द्रास, जोजिला दर्रा पार, श्रीनगर से अमरनाथ (14,000 फुट ऊंचाई और मार्गस्थ 16,000 फुट के लगभग दूसरी चढ़ाई), विश्लाव दर्रा होते हुए शिमला से रोहतांग (12,000 फुट) और वहां से पठानकोट के अन्य टेढ़े-मेंढ़े रास्ते तय किए गए।

यूरोप से वापसी के उपरांत, 1920 में बीरबल ने लंबे टेढ़े-मेंढ़े रास्ते तय किए जिनमें पठानकोट से लेह सर्वाधिक महत्वपूर्ण था। स्वयं उत्कट वनस्पतिविज्ञानी स्वर्गीय प्रो. एस.आर. कश्यप के सान्निध्य में पठानकोट-खजियार-चंबा, लेह और वहां से जोजिला दर्रा-बालटाल-अमरनाथ-पहलगाम और अंत में जम्मू होते हुए वापसी के इन टेढ़े-मेंढ़े पथों का अनुसरण किया गया था। यह दौरा कई सप्ताहों तक चला और हिमालयी पादपों के प्रचुर संग्रहण का परिणामी रहा। बीरबल ने 1923 और 1944 के मध्य अपनी धर्मपत्नी के साथ क बार हिमालय में कई टेढे़-मेंढ़े मार्ग तय किए।

बीरबल साहनी

एक घटना थी जो दर्शाती है कि अपरिपक्व बीरबल ने साहसिक कार्य में अपरिचित व अभिरूचि हेतु जिज्ञासा कैसे प्राप्त की। 1905 में ग्रीष्म ऋतु में पूरा परिवार मुर्री चला गया। एक सुहावनी सुबह को उसने कुछ रूमाल व एक या दो कनस्तरों को एकत्रित किया तथा अपनी बड़ी बहन व भाई से साथ चलने को कहा। छोटे ने किया वे पूर्णरूपेण समझ गए कि वह किसकी तैयारी में था। वे आत्मा की जाने बगैर घर से शांतिपूर्वक निकले तथा कस्बे के उत्तर में एक खड्ड में उतर गए, उतरते और उतरते चले गए जब तक कि वे धारा तक न पहुंच गए। नीचे जाने की यात्रा बहुत कठिन नहीं प्रतीत हो रही थी यद्यपि ऐसे बहुत से अवसर आए जब बीरबल ने उनकी खाइयों और शिलाखंडों में मदद की। पीछा करने के आवेश में, जब भूख के कष्ट ने कार्य को असहनीय बनाने के अलावा समय का पता न चला जब उन्होंने वापसी यात्रा शुरू की तब तक रात होने वाली थी।

चढ़ा अधिकाधिक कठिन होते चला गया तथा बीरबल को शिलाखंडों के ऊपर से सबसे पहले सामना करना था तथा बाद में अन्य को जो पश्च दर्शन में आज पर्वत जैसे दिखते हैं। रात हो गई तथा पूरा परिवाल खलबली की हालत में था। युवा अन्वेषकों की तलाश करने को नौकरों को लालटेन के साथ भेजा जा चुका था थोड़ी जानकारी थी उन्हें कहाॅं ढूंढें किसी को चूंकि क्षणिक विश्वास न था कि वे कस्बे से बाहर गए हैं। वे थके हुए भूखे एवं खून बहाते परौं से देर रात घर पहुंचे, इसके अलावा, कम कहना अच्छा बोलना है, ग्रहण करने में सर्वोत्तम प्रत्याशा सहित हमारे गालों से अनियंत्रित अश्रु धाराएं बहरही थीं, परंतु युवा बीरबल बिल्कुल शांत थे, तथा जब पिता ने उनसे पूछा कि बिना अनुमति के घर से जाना और अपने संग बच्चों को भी ले जाने का क्या मतलब था, उन्होंने सिर्फ उत्तर दिया वह केकडों को संगृहीत करना चाहते थे। इस असाधारण कारण ने क़रीब-क़रीब घटना को मोहित कर दिया यद्यपि अंततोगत्वा इसने उनका बचाव भी सिद्ध कर दिया। ‘‘केकडे, वास्तव में!’’ पिता का पहला दृश्यांश था इसके साथ उन्होंने कदम आगे बढ़ाया। कुछ पल के लिए सबने सोचा कि सब कुछ ख़तम हो गया तथा उन्हें संभावना की विलक्षण अनुभूति के साथ उत्कंठा को समर्थन मिला। किंतु ऐसे साहसिक कार्य के प्रति उनका लगाव तथा नई चीजों के बाद खोज जो कि उन्होंने खुद ही जांची थीं और ज़्यादा कुछ नहीं कहा। बीरबल ने अपने पिता को और ज़्यादा दुर्गम व ख़तरनाक अभियानों में संग लिया। थोडे़-से उपकरण, और पादुका हेतु रस्सी निर्मित चप्पलें तथा स्थानीय मार्गदर्शक के साथ ज़ोजिला दर्रे से ज़्यादा दूरी नहीं मचोई हिमनद को पार करना इन सभी में अति उल्लेखनीय और उज्जवल था। यहां यही था ये नीचे देखना, उन्होंने गहरी खाई घाटी में ऊध्र्वाधर, जमा हुआ और इसकी बर्फीली क़ब्र में परिरक्षित एक घोडे़ को देखा। जैसे ही वह अंधेरे, विस्मय प्रेरक दरार में झांकने को झुके इसने रोंगटे खड़े कर दिए और पूर्व चेतावनी, अतत्पर क्योंकि वह ऐसे साहसिक कार्य हेतु थे। यह था कि बीरबल ने इंग्लैंड प्रस्थान से ठीक पहले ग्रीष्मकाल के दौरान लाल बर्फ (दुर्लभ बर्फ कवक) खोजी और संगृहीत की। संजोए गए अंश को प्रो. सीवर्ड ने परीक्षित किया तथा वनस्पतिविज्ञान विभाग, कैंब्रिज में अभी भी परिरक्षित है। कैंब्रिज में युवा वनस्पतिविज्ञानी हेतु यह अच्छा परिचय था। भारत में विगत काफी समय से ऐसा कवक नहीं मिला है। साहसिक कार्य के जोश के अलावा उनमें अपने अरिपक्व दिनों में शैतानी का प्रचुर अनुपात था। एक बार परिवाल शिमला में ब्रह्मो समाज से लगे हुए सदम में रूका जिसे उन्होंने अन्य परिवार के साथ साझी किया। उनके निवास और समाज के भवन के बीच एक भू-खंड था जिसमें हमने संयुक्त रूप से शाक-सब्जी वाटिका उगाई। किसी तरह छुट्टियां कम कर दी गईं और कुटुंब को शिमला के शीत शिखर को और बलबत्ता इसके संग खीरे व अध-पके मक्का-भुट्टों को भी छोड़कर जाना था। यह बड़ा धक्का था तथा बीरबल ने समस्त खाद्य फलों को उखाड़ने की योजना बनाई। जैसेकि ये काफी नहीं था, प्रस्थान पूर्व की रात्रि में कैंची के पड़े युग्मों से तने के नीचे से पौधों की जड़ों को अपने नेतृत्व में उसने काट दिया। परिवार के प्रस्थान के उपरांत, पौधे प्राकृतिक रूप से शनै शनै स्थिर रूप से, रहस्यात्मक रूप से मुरझााने शुरू हो गए। उसके पहले के पड़ोसियों ने सोचा कि क्या यह गिरने की बीमारी थी? उन्होंने पौधों में खूब पानी लगाया उन्होंने जितना ज़्यादा पानी लगाया उतनी ही तेजी से वे मुरझाते गए। परंतु पड़ोसियों को इसका राज पता नहीं चला। जब तक कि वे लहौर वापस नहीं पहुॅंच गए! तथा इसे वे बाखूबी अभी भी याद करते हैं।

कुछ सालों बाद शैतानी के प्रति झुकाव खुशी में तब्दील हो गया। उनका प्रिय खिलौना बंदर को बहुत से लोग याद रखेंगे जो उनके साथ बहुत से महाद्वीपों पर गया तथा जिससे वह बच्चों का मनोरंजन कराया करते थे। यह वानर म्युनिख में फुटपाथ विक्रेता से खरीदा गया था। बीरबल ने कुछ बच्चों को ऐसे ही वानर से खेलते हुए देखा था तथा वह इससे बहुत मनोरंजित हुए थे। तमाम दुकानों पर खोजने के बाद वह उसी नकल का खरीदने में कामयाब हुए और प्रायः बगीचे में जाते थे जहाॅं छोटे बच्चों के खेल को पहले उन्होंने देखा था।

बल्कि बीरबल संवेदनशील प्रकृति के थे। उन्होंने शुरूआती दिनों से बड़ा लगाव था जिसकी व्याख्या उनके कालेज कैरियर की घटना से की जा सकती है। जब इंटरमीडिएट परीक्षा के परिणाम, जिसमें उनके निकटतम एवं अविभाज्य मित्र ने परीक्षा दी थी, घोषित हुए थे। दुर्भाग्य के अकथनीय आघात से उनकी कक्षा का सहपाठी असफल घोषित किया गया था। इसने घर में तूफान ही नहीं मचाया बल्कि करीब करीब त्रासदी का दौर था क्योंकि बीरबल दो दिनों तक बालक की भांति रोते रहे और खाना खाने से इन्कार कर दिया। काफी दिनों तक उनकी चाल में चिंता झलकती रही और यह अति शनै-शनै हुआ कि उन्होंने इस विचार से स्वयं को स्वीकार किया कि कालेज में उनका मित्र एक साल पीछे छूट गया है।

निष्पक्षता और निष्पक्ष व्यवहार उनकी अति उतकृष्ट अभिलाषा थी। लाहौर में (इंग्लैंड में इस समय सबसे बडे़) आंशिक रूप से बड़े भाई होने के नाते तथा आंशिक रूप से स्नेही मिज़ाज़ की वजह से कुटुंब में छोटे भाइयों व बहनों से उन्हें तटस्थ पंच के रूप में पहचाना। चाहे वह पेन्सिल या पुस्तक के स्वामित्व के बारे में झगड़ा हो या सर्दी की रातों में सबसे बाद में घर की बत्ती बुझाने की बात हो, हम सब उनके निर्णय को देखते थे तथा ज्यादा महत्वपूर्ण क्या है कि सभी लोग इसका अनुपालन करते थे।


बृहत वैज्ञानिक दिलचस्पी

बीरबल की दिलचस्पियाॅं अति बृहत थीं तथा रोहतक में 1936 में नए नए सिक्के ढालने की खोज इसका परिचय देती हैं। भू-वैज्ञानिक हथौड़े से पुरावनस्पतिविज्ञान की यह पुरातात्विक खोज मानव की मार्मिकता एवं बहुमुखी प्रतिभा द््योतित करती है। यह उनकी प्रतिभा को सम्मान है कि उन्होंने न केवल अनूठी खोज की अपितु इन नएन्नए सिक्कों को ढालने के अध्ययन में अपना दिल और आत्मा लगा दी। मुद्राविज्ञानविद् के अनुरूप विषय में अनुसंधान का नूतन मानक व्यवस्थित करते हुए उन्होंने 1945 में न्युमिस्मेटिक सोसाइटी के जर्नल में अपने निष्कर्षों को अद्वितीय पुस्तिका में प्रकाशित किया। इसके प्रयोजनार्थ उन्होंने कुछ भारतीय नए सिक्के ढालने के साथ-ही-साथ चीन के भी अध्ययन में स्वयं को व्यवस्थित किया। उन्होंने समस्त भू-वैज्ञानिक समस्याओं में अति रूचि ली जो कि उनके पुरावनस्पतिक कार्य में सीधे समाहित न थीं। किंतु यह कहना चाहिए कि यदि किसी ने उन्हें गहराई से कुरेदा है क्रोड में सदैव एक वनस्पतिविज्ञानी को पाया है।

अपने वैज्ञानिक रूचियों के अलावा, उनका संगीत के प्रति भी बहुत लगाव था और वह सितार एवं सारंगी बजाते थे। उन्हें चित्रकला एवं मिट्टी माॅडलिंग में रूचि थी तथा जब उन्हें दूसरे कार्यों से फुर्सत मिलती थी इन चित्रकलाओं में और जानकारी के लिए आट्र्स स्कूल, लखनऊ जाकर सुअवसरों का सदुपयोग किया। स्वतंत्र दृष्टिकोण बीरबल का जीवन के प्रति मनोभाव दूसरा पहलू था जो मस्तिष्क में प्रबलता से आता है, जो विज्ञान के प्रति स्वतंत्र दृष्टिकोण एवं अनुराग दर्शाता है जिसके प्रति उनकी जिंदगी भर तथा जिसमें वह स्वयं का एवं राष्ट्र का नाम बाद में करने में श्रद्धा रखते रहे। पिता उन अनुशासकों में से एक थे जिनमें एक मात्र सुझाव प्रायः निपटारे हेतु पर्याप्त रहता था जहाॅं से निर्णय स्थापित होता था।

जीवित पौधों पर प्रोफेसर साहनी का योगदान (पी. माहेश्वरी, पैलियोबोटनिस्ट 1:17-21)

अपने ऐतिहासिक पहलू में विज्ञान की तुलना एक ऐसे वृक्ष से की जा सकती है जो लगातार शाखाएँ बनाता रहता है क्योंकि ज्ञान का योग बढ़ता जाता है और क्षेत्र का एक उपविभाजन आवश्यक हो जाता है। कभी-कभी, विशेष उत्साह की एक कली प्रकट होती है और एक ऐसी शाखा को जन्म देती है जो इतनी प्रभावशाली और महत्वपूर्ण होती है कि यह पूरे जैविक शरीर की रूपरेखा को बदल देती है। इस तरह की एक घटना भारतीय वनस्पति विज्ञान में तब घटित हुई जब युवा साहनी ने 1911 में लाहौर से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान स्कूल में आगे की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गए। दिवंगत प्रो. ए. सी. सीवार्ड जैसे महान गुरु के प्रभाव में आकर, उन्होंने तेजी से सीखा, जीवित और जीवाश्म पौधों की आकृति विज्ञान में बहुत अंतर्दृष्टि और अनुभव प्राप्त किया और भारत लौटने पर अनुसंधान का एक समृद्ध स्कूल शुरू किया, जो अब पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। आमतौर पर यह माना जाता है कि प्रो. साहनी एक पैलियोबोटैनिस्ट थे, और यह इस क्षेत्र में उनका काम था जिसने उन्हें रॉयल सोसाइटी की फैलोशिप और भारतीय विज्ञान कांग्रेस की अध्यक्षता जैसी कई विशिष्टताएँ दिलाईं। जबकि यह मूलतः सत्य है, वर्तमान लेखक जैसे लोग, जो उनके व्यक्तिगत संपर्क में आए, वे तुरंत इस बात से सहमत होंगे कि वे बहुत व्यापक रुचियों वाले वनस्पतिशास्त्री थे, जो पौधों के जीवन के बारे में हमारे ज्ञान को आगे बढ़ाने के लिए हर अवसर का लाभ उठाने के लिए उत्सुक थे। जब मुझे प्रो. साहनी के पूर्व शिष्य और मेरे अपने पूर्व शिष्य तथा द पैलियोबोटनिस्ट की संपादकीय समिति के सचिव डॉ. आर.वी. सिथोले ने बताया कि प्रो. टी.जी. हाले पैलियोबोटनिकल पक्ष पर उनके काम की समीक्षा करेंगे, और मुझे जीवित पौधों पर उसकी समीक्षा करनी चाहिए, तो मैंने, इसलिए, तुरंत उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया और यह संक्षिप्त रेखाचित्र तैयार करने के लिए निकल पड़ा। साहनी का पहला शोधपत्र जिसका शीर्षक था "जिन्कगो और जीवाश्म पौधों के बीजांडों में विदेशी पराग" 1915 के न्यू फाइटोलॉजिस्ट में प्रकाशित हुआ था, कैम्ब्रिज पहुंचने के कुछ ही साल बाद। यहां उन्होंने मोंटपेलियर से प्राप्त इस पौधे के लगभग एक दर्जन बीजांडों में से कम से कम आठ में जिन्कगो के अलावा अन्य पराग कणों की उपस्थिति दर्ज की। उनमें से अधिकांश में दो प्रोथैलियल कोशिकाओं की उपस्थिति दिखाई दी, जो उनकी अविकसित प्रकृति को दर्शाती है और एक ने अपने व्यास से दोगुनी लंबी ट्यूब बनाने के लिए अंकुरित किया था। हालाँकि यह अपने आप में एक दिलचस्प अवलोकन है और लेखक की विवेकशील शक्ति का काफी संकेत है, यह पेपर का उत्तरार्द्ध है जिसने विशेष रूप से साहनी की आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि को उनके करियर के शुरुआती चरण में भी प्रकट किया। उन्होंने लिखा: "यदि जीवाश्म अवस्था में एक समान उदाहरण पाया जाता, तो यह सभी संभावनाओं में पराग कणों और बीजांड को एक ही प्रजाति के संदर्भ में ले जाता"। इसके अलावा, केवल अंकुरण के तथ्य का उपयोग बीजांड में संलग्न जीवाश्म पराग कणों की पहचान के बारे में निष्कर्षों के समर्थन में नहीं किया जा सकता है। साहनी का अगला पेपर, 1915 के न्यू फाइटोलॉजिस्ट में प्रकाशित हुआ, नेफ्रोलेपिस वैलुबिलिस की शारीरिक रचना से संबंधित था, जिसे प्रोफेसर एफ. टी. ब्रूक्स द्वारा कुआलालंपुर, फेडरेटेड मलय राज्यों के पास एकत्र किया गया था, जो उस समय कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान स्कूल में व्याख्याता थे। यह एक बहुत ही विचित्र फर्न है जिसमें मातृ पौधे से उत्पन्न होने वाले बहुत लंबे स्टोलन जंगल के पेड़ों पर 16 मीटर की ऊंचाई तक चढ़ते हैं। अंतराल पर उन पर पैदा हुए पार्श्व पौधे मातृ पौधे से काफी ऊंचाई तक पहुंच जाते हैं जो मिट्टी में जड़ें जमा लेता है। समय-समय पर पूर्व को जमीन पर गिरा दिया जाता है जिसके बाद वे अपनी जड़ें पैदा करते हैं। साहनी ने स्टोलन की शारीरिक रचना और पार्श्व पौधों के मूल प्रोटोस्टेल के डिक्टियोस्टेल में परिवर्तित होने के तरीके का विस्तृत विवरण दिया। दुर्भाग्य से मातृ पौधे का कोई भी हिस्सा उनके पास उपलब्ध नहीं था और इसलिए, अधिक विवरण नहीं दिया जा सका। नेफ्रोलेपिस वैलुबिलिस से साहनी ने नेफ्रोलेपिस वैलुबिलिस के कंदों की संवहनी शारीरिक रचना का अध्ययन किया (न्यू फाइटोलॉजिस्ट, 1916) शाखा स्टोलन का तंतु कंद के आधार में एक ठोस प्रोटोस्टेल के रूप में प्रवेश करता है, लेकिन आंतरिक फ्लोएम, पेरीसाइकिल, एंडोडर्मिस और ग्राउंड ऊतक को प्राप्त करते हुए, एक फ़नल की तरह तेज़ी से फैलता है। अंततः विस्तारित स्टेल अनियमित आकृतियों और आकारों के अंतराल से अलग स्पर्शरेखा रूप से चपटे तंतुओं के एक खोखले नेटवर्क में टूट जाता है। कंद के शीर्ष की ओर तंतु फिर से एक एकल प्रोटोस्टेल बनाने के लिए अभिसरित होते हैं। नेफ्रोलेपिस पर अपने शोधपत्रों के प्रकाशन के तुरंत बाद, साहनी ने "फिलिकेल्स में शाखाओं के विकास" पर सुदबरी-हार्डीमैन पुरस्कार के लिए एक शोध प्रबंध प्रस्तुत किया, जिसे 1917 के न्यू फाइटोलॉजिस्ट में प्रकाशित किया गया था। इसमें उन्होंने दिखाया कि एक नियम के रूप में शाखाएँ पत्तियों के संबंध में कोई नियमित स्थिति नहीं रखती हैं और उन मामलों में जहाँ ऐसा संबंध पाया जाता है”, यह संबंध, अपने विकासवादी मूल में, संभावित जैविक लाभों के कारण एक द्वितीयक घटना है, जिनमें से एक युवा कली की सुरक्षा हो सकती है। न्यू कैलेडोनिया प्रशांत के कुछ अन्य द्वीपों के साथ साझा करता है

प्रोफेसर साहनी का पैलियोबोटैनिकल कार्य (टी.जी. हाले द्वारा, पैलियोबोटैनिस्ट 1:23-41)

जीवाश्म पौधों पर बीरबल साहनी के काम पर एक सरसरी नज़र डालने से ही इसकी असाधारण व्यापकता और विविधता का स्पष्ट आभास मिलता है। वास्तव में, उनके शोधों ने पैलियोबॉटनी के लगभग पूरे क्षेत्र को कवर किया। उन्होंने न केवल संवहनी पौधों के सभी प्रमुख समूहों और लगभग सभी पौधों वाले भूवैज्ञानिक प्रणालियों से अपने शोध के लिए ठोस वस्तुओं का चयन किया; बल्कि इस विविध सामग्री से निपटने में, और अपने अधिक सामान्य विचार-विमर्श में, उन्होंने हर संभव कोण से संबंधित समस्याओं पर विचार किया। इस प्रकार जीवाश्म पौधों पर उनके काम के परिणामस्वरूप वनस्पति विज्ञान की सभी प्रासंगिक शाखाओं के साथ-साथ स्ट्रेटीग्राफी, पैलियोजियोग्राफी और भूवैज्ञानिक अनुसंधान की अन्य संबंधित शाखाओं में योगदान मिला। किसी को भी यह आभास होता है कि वे काफी परिचित ज़मीन पर महसूस करते थे, चाहे वे जटिल शारीरिक संरचनाओं का अध्ययन कर रहे हों, टैक्सोनोमिक संबंधों का विश्लेषण कर रहे हों, जीवाश्म वनस्पतियों का वर्णन कर रहे हों, या जलवायु परिवर्तन या महाद्वीपों के विस्थापन की समस्याओं पर उनके असर पर चर्चा कर रहे हों। साहनी के काम की व्यापक प्रकृति के कारण वनस्पति विज्ञानियों के लिए स्पष्ट नहीं हो सकते हैं जो जीवाश्म पौधों के अध्ययन से अपर्याप्त रूप से परिचित हैं और इसलिए, विश्लेषण का प्रयास करना उचित हो सकता है।

जीवाश्म वनस्पति विज्ञान में यह देखना बिल्कुल भी असामान्य नहीं है कि एक लेखक के प्रकाशन कई ऐसे मामलों से निपटते हैं जो अतीत के पौधों से संबंधित होने के अलावा बहुत कम संबंधित हैं। पैलियोबोटैनिस्ट शायद ही कभी अपने विषयों को केवल कुछ समस्याओं में जुड़े हुए जांच को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से चुनने के लिए स्वतंत्र होता है। एक नियम के रूप में वह अपने निपटान में सामग्री पर निर्भर होता है; वास्तव में, जीवाश्म पौधों पर अधिकांश काम इस या उस संग्रह तक पहुंच के कारण हुआ है। जीवाश्म पौधे दुर्लभ हैं, सामग्री कीमती है और इसकी जांच अक्सर एक कर्तव्य प्रतीत होती है। यह वास्तव में पैलियोबॉटनी के इतिहास की एक विशेषता है कि यहां तक ​​​​कि सबसे महत्वपूर्ण प्रगति अक्सर आकस्मिक रूप से खोजी गई या प्राप्त सामग्री का अध्ययन और वर्णन करके की गई है। उदाहरण के लिए, किडस्टन और लैंग ने सामान्य आकारिकी की समस्याओं की जांच करने का लक्ष्य नहीं रखा। उनका प्राथमिक कार्य राइनी के डेवोनियन से पेट्रीफाइड प्लांट-अवशेषों की संरचनाओं की जांच, विश्लेषण और वर्णन करना था; लेकिन फिर भी, उनके काम ने संवहनी पौधों की आकृति विज्ञान से जुड़ी कुछ बुनियादी समस्याओं की हमारी अवधारणा को गहराई से प्रभावित किया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सामग्री के दावों का साहनी के मामले में अक्सर एक विशेष महत्व था। उनका देश जीवाश्म पौधों से समृद्ध है, और महत्वपूर्ण अवर्णित संग्रहों के साथ-साथ अपूर्ण रूप से खोजे गए पौधे-असर वाले भंडार उनके ध्यान की प्रतीक्षा कर रहे थे, जब उन्होंने पहली बार अकेले ही इस विशाल क्षेत्र में काम करना शुरू किया। इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे अक्सर न केवल वनस्पति विज्ञान के प्रति बल्कि भारतीय भूविज्ञान की जरूरतों के प्रति भी कर्तव्य की भावना से प्रेरित थे।

साथ ही साहनी के शोध मुख्यतः कुछ निश्चित संबद्ध अध्ययन की पंक्तियों के साथ खुद को समूहबद्ध करते हैं, जिन्हें उन्होंने स्पष्ट रूप से अन्य की तुलना में प्राथमिकता दी क्योंकि उनका संबंध सामान्य महत्व के प्रश्नों से था। उनके काम का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन समस्याओं के विश्लेषण और सर्वेक्षण से भी संबंधित था जिनका अध्ययन ठोस सामग्री के प्रत्यक्ष संदर्भ के बिना किया जा सकता था। कुल मिलाकर यह प्रतीत होता है कि उनके शोध की विविधता काफी हद तक उनकी रुचियों की विस्तृत श्रृंखला, उनके व्यापक ज्ञान और बौद्धिक बहुमुखी प्रतिभा की अभिव्यक्ति थी। उनके बहुमुखी वैज्ञानिक व्यक्तित्व की कुछ विशिष्ट विशेषताएं एक शोधकर्ता के रूप में उनके करियर के उल्लेखनीय शुरुआती चरण में ही स्पष्ट हो गईं।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि साहनी पहली बार पैलियोबॉटनी की ओर अपने कैम्ब्रिज शिक्षक स्वर्गीय प्रोफेसर सर ए.सी. सीवार्ड के प्रभाव से आकर्षित हुए थे। 1914 में स्नातक होने के बाद, उन्होंने वनस्पति विज्ञान स्कूल में शोध शुरू किया, जहाँ सीवार्ड के नेतृत्व में, जीवित और विलुप्त पौधों के अध्ययन को उस समय की तुलना में कहीं और एक साथ जोड़ा गया। सबसे पहले साहनी हाल के पौधों, मुख्य रूप से टेरिडोफाइट्स और कोनिफ़र की रूपात्मक और शारीरिक जांच में लगे रहे। जल्द ही उन्होंने जीवित पौधों के अध्ययन को जारी रखते हुए पैलियोबॉटनी का काम भी शुरू कर दिया। कैम्ब्रिज में अपने शेष प्रवास के दौरान, 1919 में भारत लौटने तक, उन्होंने अपना समय अनुसंधान की इन शाखाओं के बीच विभाजित किया, और दोनों में आश्चर्यजनक रूप से उत्कृष्ट कार्य किया।

पैलियोज़ोइक फ़र्न की शारीरिक रचना और आकृति विज्ञान

पैलियोज़ोइक फ़र्न जैसे पौधों पर साहनी का काम मुख्य रूप से कोएनोप्टेरिडिनेई और विशेष रूप से ज़ाइगोप्टेरिडेसी परिवार पर केंद्रित था। चूँकि इस पूरी तरह से विलुप्त समूह के बारे में जानकारी वनस्पति विज्ञानियों के बीच बहुत आम नहीं है, इसलिए साहनी के काम के दायरे और महत्व को समझना आसान बनाने के लिए कुछ सामान्य टिप्पणियाँ करना उचित होगा। कोएनोप्टेरिडीनी विभिन्न मामलों में असाधारण रुचि के हैं। साथ ही वे शोध के विषय के रूप में असामान्य कठिनाइयाँ प्रस्तुत करते हैं। सामग्री ज्यादातर पत्थर जैसी है, और संरचना अक्सर खूबसूरती से संरक्षित है; लेकिन यह बहुत खंडित भी है और पौधों की आदत के बारे में बहुत कम जानकारी देती है। कुछ मामलों में केवल तना ही ज्ञात है, अधिक बार केवल पत्ती के डंठल और पत्तियों के रेकिस; लेमिना और स्पोरैंगिया शायद ही कभी संरक्षित होते हैं। विभिन्न भागों के बीच संबंध, एक नियम के रूप में, तुलनात्मक अध्ययनों के माध्यम से स्थापित किया जाना चाहिए। केवल बहुत कम ही वास्तव में अलग-अलग टुकड़ों को एक साथ जोड़कर अधिक प्रत्यक्ष प्रमाण प्राप्त करना संभव हो पाया है, एक ऐसा काम जिसमें साहनी ने अग्रणी भूमिका निभाई थी। कुल मिलाकर, कोएनोप्टेरिडीनी शायद ही पैलियोबॉटनी में पहले अध्ययन के लिए एक आकर्षक विषय प्रतीत होता है। हालाँकि, साहनी इस कार्य के लिए अच्छी तरह से तैयार थे, क्योंकि उन्होंने सीवार्ड (1915ए, 1916, 1917) के तहत स्नातकोत्तर छात्र के रूप में जीवित फर्न की शारीरिक रचना पर काफी शोध किया था।

इस समय कोएनोप्टेरिडीनी को हाल ही में कई प्रमुख लेखकों द्वारा महत्वपूर्ण प्रकाशनों में शामिल किया गया था: डी. एच. स्कॉट, ए. जी. टैन्सले, आर. किडस्टन और डी. टी. आर. ग्वेने-वॉघन, डब्ल्यू. टी. गॉर्डन और विशेष रूप से पी. बर्ट्रेंड। तब और अब भी दिलचस्पी सबसे बड़े उपखंड, ज़ाइगोप्टेरिडेसी के इर्द-गिर्द केंद्रित है। यह परिवार अत्यधिक मिश्रित पत्तियों की असाधारण शाखाओं के लिए उल्लेखनीय है: अधिकांश प्रजातियों में प्राथमिक पिना चार पंक्तियों में स्थित हैं, दो दोनों तरफ, और वे हमेशा इस तरह से उन्मुख होते हैं कि उनके तल मातृ रेकिस के तल से समकोण बनाते हैं। इस अजीबोगरीब प्रकार की समरूपता में, और कुछ शारीरिक विशेषताओं में, ज़ाइगोप्टेरिडेसी के पत्ते सामान्य पत्तियों से बहुत अलग हैं; कम से कम उनके समीपस्थ भागों में तो यह कहा जा सकता है कि वे तने और पत्ती दोनों के गुणों को मिलाते हैं। पी. बर्ट्रेंड ने वास्तव में उनके डंठलों को एक विशेष प्रकार के अंग का प्रतिनिधित्व करने वाला माना था, जिसे उन्होंने फाइलोफोरस नाम दिया था; हालाँकि, इस शब्द का उपयोग यहाँ नहीं किया जाएगा।

इन पौधों पर साहनी का पहला शोधपत्र (1918) ज़ाइगोप्टेरिडियन पत्ती की शाखाओं का एक आलोचनात्मक अध्ययन था। चूँकि यह मुख्य रूप से वर्तमान विचारों की चर्चा से संबंधित था, इसलिए कोई यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि साहनी को सबसे पहले जीवित फ़र्न की शारीरिक रचना की जांच के संबंध में साहित्य के अध्ययन द्वारा कोएनोप्टेरिडिनेई के विषय की ओर आकर्षित किया गया था। लेकिन उसी प्रकाशन में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया से एक ज़ाइगोट फ़र्न के नमूने का संक्षेप में उल्लेख किया, जिसके बारे में उन्होंने फरवरी 1917 में ही कैम्ब्रिज फिलॉसॉफिकल सोसाइटी के समक्ष एक प्रारंभिक विवरण दिया था। इस नमूने पर काम, जिसे सीवार्ड ने सुझाया था, बाद में, अधिक सामग्री के जुड़ने के माध्यम से बढ़ा और संभवतः साहनी द्वारा कोएनोप्टेरिडिनेई के अध्ययन को अपने शोध की मुख्य पंक्तियों में से एक के रूप में अपनाने का तत्काल कारण था।

ऑस्ट्रेलियाई ज़ाइगोप्टेरिडियन स्टेम की साहनी की निरंतर जांच के परिणामस्वरूप कई प्रकाशन हुए (1919 ए, 1928 डी, 1930 ए, 1932 सी)। यह प्रजाति बहुत दिलचस्प साबित हुई। इसकी संरचनात्मक विशेषताओं का अनोखा संयोजन विभिन्न जेनेरिक नामों में परिलक्षित होता है जो अलग-अलग समय पर इसके लिए लागू किए गए हैं: ज़ाइगोप्टेरिस, एंकिरोप्टेरिस, क्लेप्सीड्रॉप्सिस, और अंत में ऑस्ट्रोक्लेप्सिस, साहनी द्वारा स्थापित एक नया जीनस। श्रीमती ई. एम. ओसबोर्न ने पहले ही नोट कर लिया था कि यह पौधा स्टेल और पत्ती के निशानों की संरचना में एंकिरोप्टेरिस जीनस से सहमत है, लेकिन पेटियोलर बंडल क्लेप्सीड्रॉप्सिस के प्रकार के थे। इस बहुचर्चित जीनस की स्थापना 1856 में उंगर द्वारा अलग-अलग पेटियोल्स के लिए की गई थी, जिसमें अनुप्रस्थ खंड में देखे गए संवहनी बंडल का कुछ हद तक घंटे के आकार का या डंबल जैसा रूप था। क्लेप्सीड्रॉप्सिस पेटीओल्स का एनकीरोप्टेरिस प्रकार के स्टेल के साथ संयोजन बहुत ही आश्चर्यजनक लग रहा था, क्योंकि अन्य एनकीरोप्टेरिस तने ऐसे पेटीओल्स धारण करने के लिए जाने जाते थे जिनमें बंडलों का क्रॉस-सेक्शन अक्षर एच या डबल एंकर जैसा दिखता था - बाद की विशेषता ने जीनस को इसका नाम दिया। एक बड़ी सामग्री की जांच करके और विभिन्न टुकड़ों को एक साथ फिट करके, साहनी स्टेम की शारीरिक रचना का अप्रत्याशित रूप से पूरा विवरण देने में सक्षम थे और साथ ही असाधारण आदत को चित्रित करने में भी सक्षम थे। उन्होंने पाया कि यह पौधा एक विशाल वृक्ष-फ़र्न था, जिसका तना लगभग एक अनोखे प्रकार का था: कई पतले, द्विभाजक अक्ष, अपस्थानिक जड़ों और अपस्फीति के एक मोटे द्रव्यमान में अंतर्निहित थे और इस प्रकार एक साथ रखे गए थे, ताकि एक झूठा तना बन सके", कुछ हद तक क्रेटेशियस जीनस टेम्प्सकिया की याद दिलाता है। जीवित पौधों के नामकरण के नियमों के अनुरूप, साहनी ने एक समय (1919 ए, 1928 डी) इस प्रजाति का नाम क्लेप्सीड्रॉप्सिस ऑस्ट्रेलिस रखा। हालाँकि, एक अन्य पेट्रीफाइड स्टेम के उनके बाद के अध्ययनों से पता चला कि इससे बेतुके परिणाम होंगे, और इसलिए उन्होंने (1932 सी) ऑस्ट्रेलियाई पौधे के लिए नया सामान्य नाम ऑस्ट्रोक्लेप्सिस प्रस्तावित किया। ऐसा करते हुए उन्होंने एक पैलियोबोटैनिकल नामकरण पद्धति को अपनाया जिसे बाद में अंतर्राष्ट्रीय वनस्पति कांग्रेस के समक्ष स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया गया: कि एक "संयोजन जीनस" (प्राकृतिक जीनस) को एक नया नाम दिया जा सकता है, हालांकि प्रकार की प्रजातियों के अलग-अलग हिस्सों को पुराने जेनेरिक नामों के तहत वर्णित किया गया है, और ये - "अंग जीनस" या "फॉर्म जीनस" के अर्थ में - समान लक्षणों वाले अन्य अलग-अलग पौधों के टुकड़ों के लिए उपयोग किए जाते हैं। साहनी का बाद का काम ऑस्ट्रोक्लेप्सिस पर उनकी एक अन्य प्रजाति की जांच से काफी प्रभावित था, जिसे उन्होंने एक नए जीनस, एस्टेरोक्लेनोप्सिस (1930 ए) के रूप में भी संदर्भित किया था। इस प्रजाति का एक दिलचस्प इतिहास है। साइबेरिया से एक पेड़-फ़र्न के एक बढ़िया पेट्रीफाइड तने को बहुत पहले कई स्लैब में काट दिया गया था, जिनमें से कुछ जर्मनी के विभिन्न संग्रहालयों में अपना रास्ता खोज चुके होंगे। जब साहनी ने टुकड़ों की खोज शुरू की, तो वे अब एक साथ नहीं थे; उनमें से दो को अलग-अलग जेनेरा की प्रजातियों के रूप में भी वर्णित किया गया था: एस्टेरोक्लेना और राकोप्टेरिस। इन दो टुकड़ों को फिर से खोजकर और एक साथ जोड़कर साहनी यह साबित कर सके कि वे वास्तव में एक ही नमूने के हिस्से थे। तने के उनके पुनर्निर्माण ने, तीन अन्य टुकड़ों को भी शामिल करते हुए, पात्रों के एक और दिलचस्प संयोजन को उजागर किया। डंठल क्लेप्सीड्रॉप्सिस प्रकार के थे, लेकिन पत्ती-निशान अनुक्रम एस्टेरोक्लेना जैसा था, और पहले से अज्ञात स्तम्भ एस्टेरोक्लेना और एंकिरोप्टेरिस के बीच कुछ मध्यवर्ती प्रकार का साबित हुआ।

क्लेप्सीड्रॉप्सिस की प्रकृति और समानताएं, जिन्हें साहनी ने स्पष्ट करने के लिए बहुत कुछ किया है, एक तुच्छ मामला लग सकता है। वास्तव में, कोएनोप्टेरिडिनेई की चर्चाओं में जीनस ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। न केवल इसे एक परिवार के प्रकार के रूप में माना गया है, बल्कि इसकी व्याख्या पूरे समूह के काफी हिस्से में वर्गीकरण के आधार को प्रभावित करती है। साहनी की जांच, जिसकी यहां विस्तार से समीक्षा की गई है, जो अन्यथा अनावश्यक होती, इस प्रकार विभिन्न मामलों में व्यापक प्रभाव डालती है। उनके निष्कर्षों में से एक, जो वर्तमान लेखक की राय में अपरिहार्य है, हालांकि पी. बर्ट्रेंड द्वारा स्वीकार नहीं किया गया, यह था कि क्लेप्सीड्रॉप्सिस को एक वास्तविक वर्गीकरण इकाई के रूप में नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे केवल एक निश्चित प्रकार की संरचना वाले पेटीओल्स और रेचिस के लिए एक फॉर्म जीनस के रूप में माना जा सकता है, जो पौधों के विभिन्न समूहों में हो सकता है। बर्ट्रेंड ने एक बार सुझाव दिया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया, कि उंगर के क्लेप्सीड्रॉप्सिस रेचिस अजीबोगरीब जीनस क्लेडॉक्सिलॉन के तने से संबंधित हैं, जो थुरिंगिया के सालफेल्ड में निचले कार्बोनिफेरस में उनके साथ जुड़े हुए हैं। साहन (1930 ए, 1932 सी) ने भी यही विचार रखा, और दोनों सहयोगियों ने वास्तव में मैत्रीपूर्ण सहयोग में रेचिस और तनों के बीच जैविक संबंध स्थापित करने की कोशिश की। लेकिन कोई निश्चित प्रमाण सामने नहीं आया, और 1941 में बर्ट्रेंड ने क्लेप्सीड्रॉप्सिस को एक स्वतंत्र जीनस के रूप में बनाए रखा, जो क्लेप्सीड्रेसी परिवार का प्रकार था। उन्होंने इस परिवार और क्लेडॉक्सिलॉन को अलग-अलग क्रमों में भी रखा: पाइलोफोरेल्स और क्लैडॉक्सिलेल्स! इस अत्यंत जटिल विवाद का नतीजा चाहे जो भी हो, अंगर की पुरानी प्रजाति क्लेप्सीड्रॉप्सिस एंटिका को अकेला छोड़ दिया गया और उसे स्टेम प्रदान करने के सभी प्रयासों के बाद भी उससे कोई जुड़ाव नहीं रहा। क्लेप्सीड्रॉप्सिस समस्या में शामिल विभिन्न पौधों का अध्ययन करने में लगे रहने के दौरान, साहनी ने एक अलग तरह के जाइगोप्टेरिडियन फर्न (1932 डी) पर शोध शुरू किया। 1929 में यूरोप में अपने दौरे के दौरान उन्होंने न केवल पहले से संदर्भित जांच के लिए सामग्री एकत्र की, बल्कि अपना ध्यान (1932 डी) अस्पष्ट प्रजाति जाइगोप्टेरिस प्राइमेरिया (कोट्टा) कॉर्डा की ओर भी लगाया। पुराने जीनस जाइगोप्टेरिस (कॉर्डा, 1845), जिसने परिवार को अपना नाम दिया है, में एक बार कई प्रजातियां शामिल थीं। इनमें से एक को छोड़कर सभी को बाद में अन्य जेनेरा में स्थानांतरित कर दिया गया - वास्तव में कम से कम चार के बीच विभाजित किया गया। शेष प्रजातियाँ, ज़ेड प्रिमेरिया, केवल केमनिट्ज़ के पर्मियन से एक सिलिकिफाइड नमूने में संरक्षित फ़र्न पेटीओल्स की संरचना पर आधारित थीं। माना जाता था कि यह नमूना अस्तित्व में एकमात्र था, लेकिन इसके कटे हुए हिस्से व्यापक रूप से बिखरे हुए थे। साहनी ने इंग्लैंड, फ्रांस और विशेष रूप से जर्मनी के कम से कम आधा दर्जन संग्रहालयों में पेटीओल्स के इन टुकड़ों की पहचान की और उनका अध्ययन किया। लेकिन बर्लिन पहुँचने पर उन्हें एक और नमूना दिखाया गया, जिसे पहले अनदेखा कर दिया गया था, जिसमें एक प्रोटोस्टेलिक स्टेम संरक्षित था। इस मामले में भी, साहनी पौधे की आदत को फिर से बना सकते थे, जो एक पेड़-फ़र्न साबित हुआ, जिसमें पेटीओल-बेस और अपस्थानिक जड़ों के कवच द्वारा समर्थित एक पतली धुरी थी। विभिन्न भागों की शारीरिक संरचना की जाँच ने सबसे अप्रत्याशित परिणाम दिए। तना, पत्ती-निशान अनुक्रम और जड़ें पहले से ज्ञात जीनस बोट्रीकियोक्सिलॉन के प्रकार की पाई गईं, जो कि बड़ी मात्रा में द्वितीयक लकड़ी के साथ एक आदिम फर्न के रूप में उल्लेखनीय है। दूसरी ओर, पेटीओल्स में एटेप्टेरिस की संरचना थी, जो एक बड़ा जीनस था जिसके केवल विशिष्ट पत्ते ही ज्ञात थे। इस प्रकार, तीन जेनेरा की मुख्य विशेषताएं, जो सभी सामान्य पाठ्य-पुस्तकों से परिचित हैं, एक ही नमूने में संयुक्त पाई गईं! यदि यह तना उस समय ज्ञात होता और संतोषजनक ढंग से अध्ययन किया गया होता, तो यह संभव है, साहनी टिप्पणी करते हैं, कि जेनेरा बोट्रीकियोक्सिलॉन और एटेप्टेरिस की कभी स्थापना नहीं हुई होती। हालाँकि, साहनी अपनी खोज के स्पष्ट लेकिन परेशान करने वाले नामकरण संबंधी परिणाम को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक थे, और उन्होंने दो अन्य प्रजातियों को ज़ाइगोप्टेरिस में विलय नहीं किया। ग्राममेटोप्टेरिस बाल्डौफी (1932 ग्राम) पर अपने काम में साहनी ने एक पेड़-फ़र्न से निपटा था जिसे एक अलग परिवार, बोट्रीओप्टेरिडेसी में रखा गया था। इस अध्ययन में भी कई बिखरे हुए टुकड़ों की तुलना शामिल थी जिसमें 1915 में खोजे जाने पर केमनिट्ज़ के निचले पर्मियन से एकमात्र ज्ञात तना टूटा हुआ पाया गया था। इस प्रजाति की संरचना और समानताओं की नई व्याख्या - और रेनॉल्ट के अपूर्ण रूप से ज्ञात जीनस ग्राममेटोप्टेरिस - 1929 और 1930 में साहनी के यूरोपीय दौरों का एक और महत्वपूर्ण परिणाम था। उन्होंने ग्राममेटोप्टेरिस को बोट्रीओप्टेरिडेसी से हटाने के लिए ठोस सबूत पाए, और कुछ हिचकिचाहट के साथ इसे ज़ाइगोप्टेरिडेसी में रखा, जबकि ओसमुंडेसी के साथ इसकी महान समानता पर जोर दिया। इन उदाहरणों से पता चलता है कि कोएनोप्टेरिडीनी पर साहनी का काम, एक नियम के रूप में, नए और दिलचस्प संग्रहों का वर्णन करने में शामिल नहीं था, जो आसानी से महत्वपूर्ण परिणाम दे सकते थे। इसके बजाय, उन्होंने अध्ययन की निश्चित रेखाओं का अनुसरण किया, और इस उद्देश्य के लिए उन्हें कई संग्रहालयों और विभिन्न देशों में सामग्री की खोज करनी पड़ी। जिन नमूनों का अध्ययन करने का उन्हें अवसर मिला, वे शायद ही कभी नए थे; अक्सर उन्हें पिछले कार्यकर्ताओं द्वारा बार-बार जांचा गया था, और कभी-कभी वे वास्तविक प्रकार की प्रजातियां और वंश थे। उनके शोध की एक विशेषता, जिसका बार-बार ऊपर उदाहरण दिया गया है, यह थी कि उन्होंने एक ही तने के बिखरे हुए और कभी-कभी भूले हुए टुकड़ों को खोजकर एक साथ जोड़ दिया। इस उद्देश्य के लिए उन्हें अक्सर पुराने संग्रहों के भाग्य का पता लगाना पड़ता था और किसी जासूस की तरह अतीत की घटनाओं का पुनर्निर्माण करना पड़ता था। आदिम फर्न की पत्थर जैसी सामग्री पर रखे गए उच्च मूल्य को देखते हुए, साहनी अपने निपटान में महत्वपूर्ण नमूने रखने में उल्लेखनीय रूप से सफल रहे। इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी चतुराई और आकर्षक व्यक्तित्व ने उन्हें अक्सर एक प्रतिष्ठित अन्वेषक को दी जाने वाली पारंपरिक सुविधाओं से कहीं अधिक प्राप्त करने में मदद की; वे अक्सर हर जगह मिलने वाली सहायता और शिष्टाचार पर कृतज्ञतापूर्वक ध्यान देते थे। संग्रहालयों में यह "जीवाश्म खोज" ही थी जिसने साहनी को कुछ बहुत ही रोचक पौधों (हमेशा गायब पत्तियों के विन्यास को छोड़कर) के सामान्य संगठन और आदत का पुनर्निर्माण करने में सक्षम बनाया। इस पुनर्निर्माण कार्य ने, बदले में, कोएनोप्टेरिडिनिया में न केवल विशेष उदाहरणों में, बल्कि अधिक सामान्य तरीके से संबंधों की अवधारणा को प्रभावित किया। इसने वर्तमान वर्गीकरण की अस्थिर स्थिति और कृत्रिम प्रकृति को स्पष्ट रूप से प्रकट किया, यह दिखाते हुए कि अक्सर बहुत अधिक निर्भरता एकल शारीरिक विशेषताओं पर रखी गई थी। जबकि कोएनोपिडिनी पर साहनी के अधिकांश कार्य में आलोचनात्मक प्रवृत्ति थी, आलोचना निश्चित रूप से सकारात्मक और रचनात्मक थी। उनके अन्य कार्यों के साथ मिलकर इसने इस समूह में अधिक प्राकृतिक वर्गीकरण वर्गीकरण के निर्माण की धीमी और कठिन सिंथेटिक प्रक्रिया को तेज करने में बहुत मदद की। साहनी का ग्रामाटोप्टेरिस का अध्ययन कोएनोप्टेरिडिनेई के विषय पर उनका अंतिम मौलिक प्रकाशन था। अन्य महत्वपूर्ण कार्य, मुख्यतः अपने देश के जीवाश्म पौधों पर, लगभग उतना ही समय लेते थे जितना वे एक शिक्षक और अनुसंधान के नेता के रूप में अपने कर्तव्यों से बचा पाते थे। लेकिन उन्होंने कभी भी पेलियोज़ोइक फ़र्न में अपनी रुचि नहीं छोड़ी, और यूरोप में अपने प्रत्येक दौरे का उपयोग अतिरिक्त सामग्री प्राप्त करने के लिए किया। 1948 में स्टॉकहोम में कुछ महीनों तक रहने के दौरान उन्होंने स्वीडिश म्यूजियम ऑफ़ नेचुरल हिस्ट्री में विभिन्न कोएनोप्टेरिड्स का अध्ययन किया, और जब उनकी मृत्यु की खबर आई, तो वहाँ उनके लिए कुछ नमूने वास्तव में रखे जा रहे थे। साहनी के काम का कोएनोप्टेरिडीनी के बारे में हमारे ज्ञान में क्या मतलब है, इसकी अंतिम अभिव्यक्ति के रूप में महान अधिकारी पॉल बर्ट्रेंड की एक टिप्पणी - संक्षिप्त, लेकिन बिंदुवार - उद्धृत करना उचित लगता है। एक ही क्षेत्र में काम करने वाले ये दो प्रमुख कार्यकर्ता हमेशा घनिष्ठ मित्र बने रहे, लेकिन पैलियोबोटैनिकल मामलों में वे हमेशा एक ही विचार के नहीं थे। साहनी ने हाल ही में अपने कुछ सहयोगियों के विचारों की आलोचना की थी, जब 1933 में बर्ट्रेंड ने कोएनोप्टेरिडीनी की जांच में सबसे महत्वपूर्ण चरणों का खाका खींचा था। वॉन कॉट्टा, कॉर्डा और उंगर के अग्रणी काम से शुरू करते हुए, उन्होंने इन जांचों के इतिहास में चार मुख्य अवधियों को अलग किया। इनमें से अंतिम के बारे में उन्होंने लिखा: "4:e period, de 1920-1933: यह period inrégistra des progress decisifs, dus surtout aux travaux mentionable de B. साहनी ..."।

भारतीय भूविज्ञान में बीरबल साहनी का योगदान (एस.आर. नारायण राव, पैलियोबोटनिस्ट 1: 46-48)

1886 में भारतीय गोंडवाना वनस्पतियों पर फीस्टमैंटल के क्लासिक कार्य के पूरा होने के बाद से तीन दशकों से भी अधिक समय तक जीवाश्म पौधों के अध्ययन को गंभीर झटका लगा था क्योंकि भारतीय भूवैज्ञानिक भूवैज्ञानिक कालक्रम में उनके महत्व के बारे में संशय में थे। भूवैज्ञानिक काफी हद तक उस दृष्टिकोण से प्रभावित थे जो डब्लू. टी. ब्लैनफोर्ड ने 1876 में अपनाया था कि जीवाश्म पौधों पर आधारित साक्ष्य को सावधानी से प्राप्त किया जाना चाहिए, और यह कि ऐसे साक्ष्य कुछ मामलों में समुद्री जीवों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के विपरीत थे। वर्ष 1920, जिसमें भारतीय गोंडवाना पौधों के संशोधन पर सीवार्ड और साहनी की मात्रा प्रकाशित हुई, भारतीय भूविज्ञान और पुरावनस्पति विज्ञान के इतिहास में एक मील का पत्थर है: यह वर्ष भारत में पुरावनस्पति विज्ञान अनुसंधान के पुनरुद्धार का प्रतीक है, जिसमें पौधों के जीवाश्म भारतीय भूविज्ञान की तस्वीर में अधिक से अधिक आ रहे हैं। प्रो. साहनी वनस्पतिशास्त्री और भूविज्ञानी का एक दुर्लभ संयोजन थे और दोनों विज्ञानों में उनकी अद्वितीय स्थिति ने उन्हें उन दोनों के बीच की खाई को पाटने के लिए सबसे उपयुक्त बना दिया। उन्होंने भूविज्ञानी को यह समझाने में किसी और से ज़्यादा काम किया कि पौधों के जीवाश्मों के अध्ययन से दूरगामी परिणाम मिलते हैं जिन्हें भूविज्ञानी अनदेखा नहीं कर सकते।

प्रो. साहनी के लिए पौधों के जीवाश्म प्राचीन वनस्पतियों के महज संयोगवश मिले अवशेष नहीं थे; उनके लिए उनका गहरा महत्व था। उनकी भूवैज्ञानिक पृष्ठभूमि और निहितार्थ हमेशा उनके दिमाग में मौजूद रहते थे। हर स्तर पर उनके काम ने भूविज्ञान के क्षेत्र को प्रभावित किया और पैलियोबॉटनी का क्षेत्र इस देश में वनस्पतिशास्त्रियों और भूवैज्ञानिकों के लिए मिलन स्थल बन गया। 1926 में भूवैज्ञानिकों को दिए गए एक यादगार संबोधन में उन्होंने कहा कि जीवाश्म पौधे वनस्पति विज्ञान का भूविज्ञान के प्रति ऋण हैं। बदले में, उनके द्वारा शुरू किया गया पैलियोबॉटनीकल शोध न केवल स्ट्रेटीग्राफिकल समस्याओं को हल करने में मददगार रहा है, बल्कि पैलियोजियोग्राफी, पिछली जलवायु और यहां तक ​​कि पृथ्वी की हलचलों के सवालों पर भी प्रकाश डाला है। साथ ही इसने आर्थिक भूविज्ञान में भी अपना योगदान दिया है।

पिछले दो दशकों और उससे भी अधिक समय में भारत में भूवैज्ञानिक चिंतन और शोध को उन्होंने किस हद तक प्रभावित किया, इसका एक संक्षिप्त लेख में पर्याप्त विचार देना कठिन है। इसी देश में पहली बार ग्लोसोप्टेरिस की खोज की गई थी और गोंडवानालैंड से संबंधित भूविज्ञान की बड़ी समस्याओं को उठाया गया था और उन पर चर्चा की गई थी। गोंडवाना की समस्याओं ने स्वाभाविक रूप से उनका काफी ध्यान आकर्षित किया। भारतीय भूविज्ञान के दो अन्य अध्याय जहां उनके शोधों का असर पड़ा, वे थे डेक्कन ट्रैप और पंजाब सलाइन सीरीज। उन्होंने माइक्रोपेलियंटोलॉजी के महत्व को इसके अकादमिक और व्यावहारिक दोनों पहलुओं में महसूस किया और माइक्रोपेलियंटोलॉजिकल तकनीक जिसे उन्होंने सलाइन सीरीज पर अपने काम में पहले ही इस्तेमाल किया था, को अन्य समस्याओं में भी विस्तारित किया: असम के तृतीयक अनुक्रम को स्पष्ट करने में और भारत में भूवैज्ञानिक समय के मापन में सहायता के रूप में।

भारतीय भूविज्ञान में कुछ ही समस्याओं ने गोंडवाना संरचनाओं के वर्गीकरण और आयु सीमा से संबंधित विवादों को जन्म दिया है। फीस्टमैंटल के मूल वर्गीकरण को ऊपरी, मध्य (पारसोरा चरण को संक्रमणकालीन चरण के रूप में) और निचले में बाद के भूवैज्ञानिकों, विशेष रूप से कॉटर और फॉक्स द्वारा प्रश्नांकित किया गया है। फॉक्स ने सोचा कि मध्य गोंडवाना के लिए कोई औचित्य नहीं था क्योंकि पंचेट चरण के ऊपर एक पुष्प विराम था। उन्होंने पारसोरा चरण को जुरासिक में शामिल किया। हालांकि, प्रो. साहनी इस बात से सहमत नहीं थे कि पारसोरा वनस्पति जुरासिक थी और दूसरी ओर, उन्होंने सोचा कि यह ट्रायस से छोटी नहीं थी और संभवतः पर्मियन जितनी पुरानी थी। भूवैज्ञानिकों ने फिर से गोंडवाना की ऊपरी आयु सीमा को निम्न क्रेटेशियस माना, क्योंकि पूर्वी तट के गोंडवाना से जुड़े निम्न क्रेटेशियस अम्मोनाइट पाए जाते हैं। इस संबंध में राजमहल की सिलिकेट वनस्पतियों ने प्रो. साहनी का काफी ध्यान आकर्षित किया। इस वनस्पति के बारे में फीस्टमैंटल का विवरण मुख्यतः पत्तियों के निशानों तक ही सीमित था और हाल के वर्षों में कई जीवाश्म युक्त स्थानों की खोज की गई थी। पत्थर के अवशेषों की आलोचनात्मक जांच से प्रो. साहनी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह वनस्पति जुरासिक थी और इसमें क्रेटेशियस की एक भी प्रजाति नहीं थी।

एक समस्या जिसमें उन्होंने कई वर्षों तक बहुत रुचि ली, वह थी महाद्वीपीय बहाव। जहाँ वेगनर का मानना ​​था कि महाद्वीप अलग-अलग होकर टूट गए थे, वहीं प्रो. साहनी ने पैलियोबोटैनिकल साक्ष्यों के आधार पर एक पूरक सिद्धांत प्रस्तुत किया कि एक बार महासागरों द्वारा अलग किए गए महाद्वीप एक-दूसरे की ओर बह गए थे। 1934 में डेक्कन इंटरट्रैपियन बेड की सिलिकिफाइड वनस्पतियों पर उनका पहला योगदान सामने आया, और इसके साथ ही एक भूवैज्ञानिक विवाद फिर से शुरू हो गया, जो अग्रणी भूवैज्ञानिकों हिसलोप और हंटर के समय से चला आ रहा है। ब्लैनफोर्ड और अन्य लोगों द्वारा भूवैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत क्रेटेशियस युग के विपरीत, प्रो. साहनी ने पाया कि वनस्पति स्पष्ट रूप से इओसीन थी, और यह जानकर खुशी हुई कि इओसीन दृष्टिकोण को बाद में भूवैज्ञानिकों से सबसे मजबूत समर्थन मिला।

साठ से अधिक वर्षों से, लवणीय श्रृंखला की आयु भारतीय भूवैज्ञानिकों के लिए एक उलझन भरी समस्या रही है और जिस तरह से प्रो. साहनी इस समस्या की ओर आकर्षित हुए, उसे उनके अपने शब्दों में (1947) बताया जा सकता है: “लगभग चार वर्ष पूर्व, जब वे खेवड़ा में नमक की खान में छात्रों के एक दल के साथ थे, लेखक के मन में खारे पानी की कुछ बूंदों को घोलने और सूक्ष्मदर्शी से जांचने का विचार आया। विचार यह था कि चूंकि नमक किसी खाड़ी या लैगून के सूखने से समुद्री जल से बना होगा, इसलिए लवणीय पानी में कम से कम कुछ सूक्ष्म कार्बनिक अवशेष अवश्य दिखाई देने चाहिए, जो इसकी भूवैज्ञानिक आयु का संकेत दे सकते हैं। यह अनुमान सही साबित हुआ: द्विबीजपत्री और शंकुधारी वृक्षों के लकड़ी के ऊतकों के काफी छोटे-छोटे टुकड़े, साथ ही पंख वाले कीटों के चिटिनस अवशेष पाए गए। इन टुकड़ों को निस्संदेह पानी में बहा दिया गया था या हवा द्वारा इसकी सतह पर उड़ा दिया गया था; और यह स्पष्ट था कि यदि ये जीव उस समय जीवित थे जब समुद्र अस्तित्व में था, तो नमक संभवतः इतना पुराना नहीं हो सकता था: जितना कि कैम्ब्रियन"। इस दृष्टिकोण ने सलाइन श्रृंखला और ऊपरी कैम्ब्रियन बेड के बीच एक ओवरथ्रस्ट की शुरूआत को आवश्यक बना दिया। डॉ. जी और अन्य क्षेत्रीय भूविज्ञानी, हालांकि, मानते हैं कि (नमक श्रृंखला) की लवण श्रृंखला अपने सामान्य स्ट्रेटीग्राफिकल अनुक्रम में है और इसलिए, उम्र में प्री-कैम्ब्रियन है। लवण श्रृंखला को नमक श्रेणी कैम्ब्रियन का सबसे कम उजागर सदस्य साबित करने वाला महत्वपूर्ण सबूत श्रृंखला और ऊपरी कैम्ब्रियन बेड के जंक्शन की प्रकृति है। डॉ. जी के अनुसार, यह जंक्शन एक अछूता तलछटी है और इसलिए समस्या यह पता लगाना है कि प्रोफेसर साहनी के माइक्रोफॉसिल्स को कैम्ब्रियन अनुक्रम में कैसे पेश किया गया। डॉ. जी के तर्कों के लिए, प्रोफेसर साहनी ने उत्तर दिया (1947): "यह दिखाने के लिए पर्याप्त कहा गया है कि क्षेत्र मानदंड जिस पर कैम्ब्रियन स्कूल के भूवैज्ञानिकों द्वारा भरोसा किया जाता है, सुरक्षित मानदंड नहीं हैं। साल्ट रेंज का सवाल जो हमें इतने लंबे समय से उलझन में डाल रहा है, अब स्थानीय महत्व की समस्या नहीं है: हमें इसे व्यापक अनुभव के आधार पर मानकों के आधार पर आंकना सीखना चाहिए... चट्टानों की गवाही और जीवाश्मों की गवाही के बीच कोई वास्तविक संघर्ष नहीं हो सकता है। जब दोनों सहमत नहीं लगते हैं, तो जीवाश्मों के प्रत्यक्ष प्रमाण पर ही भरोसा किया जाना चाहिए: जीवाश्म विज्ञान, क्षेत्रीय साक्ष्य की तुलना में स्ट्रेटीग्राफी के लिए एक अधिक सुनिश्चित आधार है।"भूविज्ञान का एक पहलू जिसमें बाद के वर्षों में उनकी विशेष रुचि थी, वह था माइक्रोपेलियोन्टोलॉजी, जिसके बारे में वे कहते हैं: "पिछले कुछ दशकों में माइक्रोपेलियोन्टोलॉजी का उदय हुआ है, जो एक महत्वपूर्ण स्थान पर है।भूविज्ञान में, विशेष रूप से तेल की खोज में, काफी महत्व है। यद्यपि यह अकादमिक भूवैज्ञानिक थे जिन्होंने पहली बार माइक्रोफ़ॉसिल्स के वैज्ञानिक मूल्य को महसूस किया, हम इस क्षेत्र में मुख्य विकास के लिए अनुप्रयुक्त भूवैज्ञानिकों और विशेष रूप से तेल और कोयला उद्योगों में कार्यरत जीवाश्म विज्ञानियों के ऋणी हैं।" अध्ययन की इस शाखा के आगे के अनुप्रयोगों के बारे में, वे लिखते हैं: "अब हम जानते हैं कि सभी तलछटी संरचनाएं जो बाहरी रूप से जीवाश्म रहित प्रतीत होती हैं, वास्तव में कार्बनिक अवशेषों से रहित नहीं हैं। इनमें से कुछ हाल ही में आश्चर्यजनक रूप से पौधे और पशु दोनों समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले सूक्ष्म जीवाश्मों से भरपूर पाए गए हैं। पंजाब के साल्ट रेंज में सलाइन सीरीज़ एक अच्छा उदाहरण है, साथ ही ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में गोंडवाना प्रणाली के आधार पर ग्लेशियल टिलाइट्स भी - और हाल ही में साल्ट रेंज में चिट्टीडिल के पास तालचिर बोल्डर बेड में भी कार्बनिक अवशेषों का पता चला है। रॉक-मैट्रिक्स के शरीर में उनके व्यापक प्रसार के कारण माइक्रोफ़ॉसिल कभी-कभी एक आयु सूचकांक प्रदान कर सकते हैं, भले ही यादृच्छिक रूप से एकत्र किए गए चट्टान के छोटे टुकड़ों का विश्लेषण किया जाए। ...भारत में, विशेष रूप से प्रायद्वीप में, अज्ञात या विवादित आयु की प्राचीन तलछटी चट्टानों से ढके बहुत बड़े क्षेत्र हैं। इन परतों में बहुत कम मेगाफ़ॉसिल पाए गए हैं, और न ही हमें भविष्य में बहुत अधिक मिलने की संभावना है। इन चट्टानों के नमूनों से माइक्रोफ़ॉसिल को पुनर्प्राप्त करने का प्रयास उपयोगी हो सकता है, जिन्हें भूवैज्ञानिकों द्वारा स्थानीय और क्षितिज से एकत्र किया जाना चाहिए जो क्षेत्रों को सबसे अच्छी तरह से जानते हैं।"

हालाँकि, उनकी गतिविधियाँ प्रयोगशाला तक ही सीमित नहीं थीं; उनका मानना ​​था कि पैलियोबोटानिस्टों को फील्ड-वर्क का अनुभव होना चाहिए और वे अपने हथौड़े, नोटबुक और लेईका के साथ जीवाश्म स्थानों पर जाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। साल्ट रेंज, राजमहल हिल्स और डेक्कन इंटरट्रैपियन क्षेत्र सभी उनके लिए परिचित क्षेत्र थे। साल्ट रेंज के उनके फील्ड-नोट्स (उनकी अप्रकाशित पांडुलिपियों के बीच संरक्षित) जटिल भूवैज्ञानिक संरचनाओं की उनकी गहरी और चतुर धारणा और समझ का प्रमाण हैं। उनके भूवैज्ञानिक भ्रमण में उनके साथ रहने वाले लोग शारीरिक और मानसिक शक्ति से भरे एक व्यक्तित्व की ज्वलंत यादें रखते हैं, जो खुद को कभी नहीं छोड़ते और जीवाश्म संग्रह और फील्ड डेटा के लिए असीम उत्साह रखते थे। अपनी मृत्यु से कुछ सप्ताह पहले उन्होंने "राजमहल पहाड़ियों की यात्रा" की। जो लोग उनके साथ थे, वे अमरजोला के पास विलियम्सोनिया-असर वाली क्यारियों की खोज का जो रोमांच और खुशी उन्होंने महसूस की थी, उसे कभी नहीं भूल सकते। पैलियोबॉटनी संस्थान के लिए उन्होंने जो कई परियोजनाएँ बनाई थीं, उनमें भारत के वनस्पति-क्षेत्रों का मानचित्रण करना एक उच्च प्राथमिकता थी। वे हिमालय के स्पीति क्षेत्र में एक अभियान का नेतृत्व करने के लिए भी उत्सुक थे।

उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालयों में भूवैज्ञानिक अनुसंधान और शिक्षण में बहुत रुचि ली और यह उनके प्रयासों के कारण था कि इस विषय को कई विश्वविद्यालयों में पेश किया गया। वे 1943 में अपनी स्थापना के बाद से लखनऊ विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के प्रमुख थे: गतिशील भूविज्ञान और पैलियोबॉटनी पर उनके प्रेरक व्याख्यान और अनुसंधान के लिए युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने और प्रशिक्षित करने में उन्होंने जो विलक्षण सफलता हासिल की, उसने जल्द ही विभाग को इस क्षेत्र में भूविज्ञान के लिए एक महत्वपूर्ण शिक्षण और अनुसंधान केंद्र बना दिया। country. दुनिया भर के प्रमुख भूवैज्ञानिकों के साथ उनकी घनिष्ठ मित्रता और मजबूत वैज्ञानिक संबंध थे, और दुनिया के किसी भी हिस्से से कोई भी भूविज्ञानी भारत आने पर लखनऊ में उनकी प्रयोगशाला और संग्रहालय में प्रो. साहनी से मिलने का अवसर कभी नहीं चूकता था। उन्होंने जो विशाल वैज्ञानिक पत्राचार छोड़ा है, वह समकालीन भूवैज्ञानिक विचारों और प्रवृत्तियों का एक बहुत ही मूल्यवान रिकॉर्ड है। प्रो. साहनी के काम या जीवन की कोई भी चर्चा उनकी पत्नी श्रीमती सावित्री साहनी के उल्लेख के बिना पूरी नहीं होगी, जिनकी समझदारी, सहानुभूति और साथ उनके लिए सब कुछ था। वह हमेशा उनकी वैज्ञानिक यात्राओं में उनके साथ रहीं और उनकी कई भूवैज्ञानिक यात्राओं में भाग लिया। उनकी अटूट भक्ति ने प्रो. साहनी की महान वैज्ञानिक उपलब्धियों में बहुत योगदान दिया।

  • विज्ञान वाचस्पति की उपाधि, कैंब्रिज विश्वविद्यालय, 1929
  • उपाध्यक्ष, पुरावनस्पतिविज्ञान अनुभाग 1930 एवं 1935
  • राॅयल सोसाइटी की अध्येता, लंदन 1936
  • महा अध्यक्ष, भारतीय विज्ञान कांग्रेस, 1940
  • अध्यक्ष, राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी, भारत, 1937-1939 एवं 1943-1944
  • सदस्य, अमेरिका की कला एवं विज्ञान अकादमी, 1948
  • अध्यक्ष, अंतर्राष्ट्रीय वानस्पतिक कांग्रेस, स्टाॅकहोम, 1950